ग्राम पंचायत का 'खजाना': सरकार गांव को पैसे कैसे भेजती है?

73वें संशोधन से लेकर ई-ग्राम स्वराज तक—एक सम्पूर्ण वित्तीय गाइड

प्रस्तावना: जब हम 'ग्राम स्वराज' की बात करते हैं, तो उसका सीधा मतलब होता है कि गांव अपने फैसले खुद ले और अपना विकास खुद करे। लेकिन, विकास के लिए सबसे जरूरी ईंधन है—'पैसा' (Funds)

आम धारणा यह है कि सरकार बोरियों में भरकर पैसा प्रधान जी को दे देती है और वे उसे खर्च करते हैं। यह सोच पूरी तरह गलत है। आज के डिजिटल दौर में, ग्राम पंचायत की फंडिंग एक अत्यंत जटिल, पारदर्शी और नियम-बद्ध प्रक्रिया है। 73वें संविधान संशोधन (1992) ने यह तय किया कि पंचायतें केवल राज्य सरकार के अधीन काम करने वाली एजेंसियां नहीं हैं, बल्कि वे 'स्थानीय सरकार' (Local Government) हैं।

इस विस्तृत रिपोर्ट में, हम ग्राम पंचायत की फंडिंग के हर पहलू की गहराई से जांच करेंगे—पैसे के स्रोत क्या हैं, वह किस रास्ते (रूट) से आता है, 'टाइड' और 'अनटाइड' फंड क्या होता है, और एक आम ग्रामीण कैसे पता लगा सकता है कि उसके गांव में कितना पैसा आया है।


भाग 1: पैसे का डिजिटल हाईवे (The Financial Pipeline)

पुराने जमाने में चेक या ड्राफ्ट के जरिए पैसा आता था, जिसमें महीनों लग जाते थे। आज यह सब बदल चुका है। अब पैसा "डिजिटल हाईवे" से आता है।

1. ई-ग्राम स्वराज और PFMS पोर्टल

आज ग्राम पंचायत का पूरा वित्तीय लेन-देन ऑनलाइन है। केंद्र सरकार ने 'ई-ग्राम स्वराज' (e-Gram Swaraj) पोर्टल लॉन्च किया है। पैसा भेजने का मुख्य तंत्र PFMS (Public Financial Management System) है।

  • प्रक्रिया: केंद्र या राज्य सरकार जब पैसा जारी करती है, तो वह सीधे राज्य के खजाने से होते हुए PFMS के माध्यम से संबंधित ग्राम पंचायत के बैंक खाते में डिजिटल रूप से (Direct Benefit Transfer - DBT) पहुँच जाता है।
  • फायदा: अब बिचौलियों की भूमिका खत्म हो गई है। लखनऊ से बटन दबते ही पैसा गांव के खाते में दिखने लगता है।

2. ग्राम प्रधान और सचिव का 'ज्वाइंट अकाउंट'

पंचायत का पैसा किसी प्रधान के व्यक्तिगत खाते में नहीं आता। हर ग्राम पंचायत का एक आधिकारिक बैंक खाता होता है। यह खाता ग्राम प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी (सचिव/Secretary) के संयुक्त हस्ताक्षर (Joint Signatures) से संचालित होता है।

डिजिटल सिग्नेचर (DSC): अब चेक काटने की जरूरत नहीं होती। भुगतान करने के लिए प्रधान और सचिव दोनों को अपनी 'डिजिटल सिग्नेचर डोंगल' (पेन ड्राइव जैसा उपकरण) लगाकर कंप्यूटर पर अप्रूवल देना होता है। इसे 'पेमेंट एफटीओ' (FTO) जनरेट करना कहते हैं।

भाग 2: धन के स्रोत—पैसा आता कहाँ-कहाँ से है?

एक ग्राम पंचायत को मुख्य रूप से चार बड़े स्रोतों से धन प्राप्त होता है। इसे हम नीचे दिए गए चार्ट से समझ सकते हैं।

फंडिंग के 4 मुख्य स्तंभ

1. केंद्रीय वित्त आयोग (CFC) - 60%
सबसे बड़ा हिस्सा
2. राज्य वित्त आयोग (SFC) - 20%
दूसरा बड़ा हिस्सा
3. विशिष्ट योजनाएं (मनरेगा/आवास) - 19%
कार्य आधारित
4. स्वयं का राजस्व (OSR) - 1%
टैक्स आदि

स्रोत 1: केंद्रीय वित्त आयोग (Central Finance Commission - CFC)

यह पंचायत की आय का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। वर्तमान में 15वां वित्त आयोग लागू है (2020-21 से 2025-26)। केंद्र सरकार पैसा राज्य को देती है और राज्य 15 दिनों के भीतर पंचायतों को ट्रांसफर करता है।

स्रोत 2: राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission - SFC)

उत्तर प्रदेश सरकार अपनी कमाई (स्टाम्प ड्यूटी, आबकारी आदि) का एक हिस्सा पंचायतों को देती है। इसका इस्तेमाल ज्यादातर कर्मचारियों का मानदेय, बिजली बिल और अन्य प्रशासनिक कार्यों में होता है।

भाग 3: 'टाइड' और 'अनटाइड' फंड का खेल

यह समझना सबसे जरूरी है। 15वें वित्त आयोग ने पैसे को दो भागों में बांटा है। प्रधान जी अपनी मर्जी से सारा पैसा खर्च नहीं कर सकते।

40% - अनटाइड फंड (Untied Fund)

"खुला पैसा"

इसे पंचायत अपनी जरूरत के अनुसार किसी भी काम में खर्च कर सकती है।


जैसे: नाली, खड़ंजा, स्ट्रीट लाइट, खेल का मैदान, पंचायत भवन मरम्म्त।

60% - टाइड फंड (Tied Fund)

"बंधा हुआ पैसा"

यह पैसा केवल दो कामों के लिए आरक्षित है (30% + 30%)।


  • पेयजल: रेन वाटर हार्वेस्टिंग, पानी की टंकियां।
  • स्वच्छता: ODF प्लस, कचरा प्रबंधन, सोख्ता गड्ढा।

भाग 4: स्वयं का राजस्व (OSR) और आवंटन फॉर्मूला

OSR (Own Source Revenue): गांधी जी का सपना था कि गांव आत्मनिर्भर बनें। सरकार ने पंचायतों को हाउस टैक्स, वाटर टैक्स, और हाट-बाजार शुल्क लगाने का अधिकार दिया है। लेकिन सच्चाई यह है कि 95% पंचायतें वोट बैंक के डर से टैक्स नहीं लगातीं।

पैसा बांटने का फॉर्मूला: क्या हर गांव को बराबर पैसा मिलता है? नहीं। यह मुख्य रूप से दो बातों पर निर्भर करता है:

  1. जनसंख्या (Population): 90% महत्व (ज्यादा आबादी = ज्यादा पैसा)
  2. क्षेत्रफल (Area): 10% महत्व

भाग 5: एक नजर में—साल दर साल फंडिंग (उदाहरण)

आइए, उत्तर प्रदेश के एक मध्यम आकार के काल्पनिक गांव 'रामपुर' (आबादी लगभग 3000) का उदाहरण लेते हैं। इससे आप समझ पाएंगे कि 5 साल में कितना पैसा आता है।

(नोट: यह आँकड़े अनुमानित हैं और केवल समझने के लिए हैं।)

वित्तीय वर्ष केन्द्रीय आयोग (CFC) राज्य आयोग (SFC) मनरेगा (सामग्री) कुल आय (लाख में)
वर्ष 1 (2021-22) 12.00 5.00 8.00 25.00 लाख
वर्ष 2 (2022-23) 13.50 5.50 10.00 29.00 लाख
वर्ष 3 (2023-24) 15.00 6.00 12.00 33.00 लाख
वर्ष 4 (2024-25) 16.00 7.00 10.00 33.00 लाख
वर्ष 5 (2025-26) 17.00 7.50 15.00 39.50 लाख
कुल 5 वर्षों में 73.50 31.00 55.00 ~ 1.60 करोड़
विश्लेषण: एक सामान्य पंचायत के पास 5 साल में करोड़ों रुपये का बजट आता है। अगर इसमें मनरेगा की मजदूरी (जो मजदूरों के खाते में जाती है) को भी जोड़ दें, तो यह आंकड़ा बहुत बड़ा हो जाता है। समस्या पैसे की कमी नहीं, सही 'प्लानिंग' की है।

भाग 6: पैसे के प्रवाह में चुनौतियां (Challenges)

  • तकनीकी जटिलता: कई प्रधानों को डोंगल और कंप्यूटर का ज्ञान नहीं होता, वे सेक्रेटरी पर निर्भर हो जाते हैं।
  • टाइड फंड का दबाव: कई बार गांव को सड़क चाहिए होती है, लेकिन खाते में पैसा सिर्फ 'पानी और स्वच्छता' का पड़ा होता है, जिसे सड़क में नहीं लगाया जा सकता।
  • GPDP का मजाक: योजनाएं ग्राम सभा में खुली बैठक में बननी चाहिए, लेकिन अक्सर बंद कमरों में कागजी कार्यवाही पूरी कर ली जाती है।

निष्कर्ष: जागरूकता ही असली ताकत है

सरकार ने पैसा भेजने का रास्ता साफ कर दिया है। अब यह गांव के लोगों पर निर्भर है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उस पैसे का सही इस्तेमाल हो।

एक जागरूक नागरिक के रूप में, आपको अपने मोबाइल में 'e-GramSwaraj' ऐप डाउनलोड करना चाहिए। इस ऐप पर आप अपने गांव का नाम चुनकर देख सकते हैं कि इस साल कितना पैसा आया और कहाँ खर्च हुआ। जब तक गांव का आम आदमी सवाल नहीं पूछेगा, तब तक असली 'ग्राम स्वराज' नहीं आ पाएगा।

— रितेश राजपूत

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